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शुक्रवार, जनवरी 21, 2011

प्रकृति : पूर्वा शर्मा की नई कविता

प्रकृति


पहाड़ों से खिलाई
फूलों से सजाई
ईश्वर ने हमारी यह धरती थी जब बनाई
कोई कमी न थी छोड़ी
पर इक ग़लती कर दी थोड़ी
दे दी अक्ल हमें ज़्यादा
ग़लत था मानवीय इरादा
तभी पहाड़ हो गए हैं खाली
क्या करे बेचारा माली
जब फूलों का ही मिट गया है नामोनिशान
अब तो ईश्वर भी हो गए हैं हैरान
छिपा है
हाँ, छिपा है इंसानी जीत की हर ख़ुशी में
एक बड़ा नुकसान
जिससे हर क़दम पर हो रही है
प्रकृति परेशान


पूर्वा शर्मा
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अजेय से साभार

9 टिप्‍पणियां:

चैतन्य शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर

माधव( Madhav) ने कहा…

sundar

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

प्रकृति के प्रति चिन्ता व्यक्त करते हुए पूर्वी की सोच और उसकी इस सुन्दर रचना के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएँ साथ ही आशीर्वाद भी!

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

सुन्दर कविता व सुन्दर भाव ....

अजेय ने कहा…

achchhe se prastut kiyaa hai . thanks.

Minakshi Pant ने कहा…

बहुत ही खुबसूरत लिखा तुमने !
मेरी तरफ से बहुत - बहुत बधाई और ढेर सारी शुभ - कामनाएं !

niranjan dev sharma ने कहा…

उत्साह बढ़ाने की लिए मैं आप सभी का आभार व्यक्त करती हूँ। विशेष रूप से अजेय अंकल का और सरस पायस का । जिनकी वजह से मेरी कविता सब लोगों तक पहुँची और आप सब की शुभकामनाएँ और आशीर्वाद मुझे मिले।
- पूर्वा शर्मा

सैयद | Syed ने कहा…

बहुत सुन्दर.. और एक अच्छा सन्देश देती हुई कविता....

Kailash C Sharma ने कहा…

समसामयिक प्तास्तुती..बहुत सुन्दर

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